भारतीय वित्त बाजार
किसी अर्थव्यवस्था में होने वाले धन के लेन देन के बाजार को उसका वित्तीय बाजार कहते हैं।
- लेन देन का आधार : ब्याज या लाभांश
- वित्त बाजार का अवधि के आधार पर वर्गीकरण
- अल्पावधिक वित्तीय बाजार (मुद्रा बाजार)
- दीर्घावधिक वित्तीय बाजार (पूंजी बाजार)
- वित्त बाजार के प्रारूप:
- संगठित (संस्थागत) वित्त बाजार
- असंगठित (गैर संस्थागत ) वित्त बाजार
- वित्त बाजार का विनियमन :
- RBI, SEBI इत्यादि वित्तीय संस्थाओं द्वारा विभिन्न अधिनियमों के प्रावधानों के अंतर्गत।
1. मुद्रा बाजार/ अल्पकालिक बाजार:
यह 364 दिन की अवधि में लेन देन वाला बाजार है।
पूंजी बाजार से दीर्घकालिक धन लेकर केवल उद्योग स्थापित किया जाता है, प्रतिदिन चालू व्यय (कार्यकारी पूंजी) के लिए उद्योगों को अल्पावधिक धन की जरूरत होती है, जिसकी पूर्ति वाले तौर तरीकों को मुद्रा बाजार कहा जाता है।
दूसरे शब्दों में अल्प मुद्रा व अतिरिक्त मुद्रा वाले पक्षों के बीच अल्पावधि के लिए लेन-देन की प्रक्रिया को मुद्रा बाजार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
मुद्रा बाजार को कार्यशील पूंजी बाजार और अल्पावधिक वित्त बाजार भी कहते हैं।
- इस बाजार में मुद्रा का विनिमय व्यक्तियों या समूहों (वित्तीय संस्थान, बैंक, सरकार, कंपनियों) के बीच होता है। अल्पमुद्रा व अतिरिक्त मुद्रा धारियों के मध्य।
- संगठित व असंगठित दोनों रूप उपस्थित।
- ब्याज दर, नकदी की उपलब्धता व मांग द्वारा निर्देशित, वर्तमान में रेपो रेट से निर्धारित।
- मुद्रा बाजार में नजदीकी मुद्रा (आसानी से मुद्रा में परिवर्तनीय) या लेनदेन में कम लागत वाली वित्तीय संपदा का भी व्यापार किया जा सकता है।
- ये बाजार व्यक्ति से व्यक्ति तक शुरू होकर, टेलीफोन से और अब इंटरनेट पर आ गया है।
- बाजार में लेनदेन बिचौलियों (दलाल) या सीधे व्यापारिक पक्षों के बीच हो सकता है।
1.1 असंगठित मुद्रा बाजार :
सरकारी विनियमन से बाहर प्राचीन काल से चला आ रहा मुद्रा बाजार।(शोषक)
- अविनियमित गैर बैंकिंग वित्तीय बिचौलिए: चिटफंड, निधि, ऋण प्रदाता कंपनियां।
- देशी बैंकर(व्यक्ति या निजी कंपनी) : गुजराती श्रॉफ, मुल्तानी अथवा शिकारपुरी श्रॉफ, मारवाड़ी कायस, चोट्टियार(चेन्नई में)
- साहूकार: स्थानीय रूप ।
1.2 संगठित मुद्रा बाजार:
मुद्रा बाजार की लेनदेन जो सरकार द्वारा नियमित उपकरणों के माध्यम से होती है। उपकरण :
- ट्रेजरी बिल
- जमा प्रमाणपत्र
- वाणिज्यिक पत्र
- वाणिज्यिक बिल
- कॉल मुद्रा बाजार
- मुद्रा बाजार म्यूचुअल फंड
- रेपो और प्रतिवर्ती रेपो
- नकद प्रबंधन बिल
2. पूंजी बाजार/ दीर्घकालिक बाजार:
किसी अर्थव्यवस्था में दीर्घावधिक (कम से कम 365 दिन और अधिक की) लेन देन वाला वित्तीय बाजार को पूंजी बाजार कहा जाता है।
विश्वभर में पूंजी बाजार में पूंजी (पूंजी = निवेश योग्य धन) लेन देन सुनिश्चित करने वाले संस्थानों में सर्वप्रथम बैंक उभरे, फिर बीमा उद्योग, म्यूचुअल फंड और अंत में प्रतिभूति/स्टॉक बाजार इसमें शामिल हुए।
पूंजी बाजार के संगठित विकास के साथ इसके लिए विनियामक बनाना सदैव मुस्किल रहा।
- भारत के द्वारा 'उद्योग' को अपनी मुख्य संचालत शक्ति चुन लेने के बाद पहली चुनौती उद्योग स्थापन के लिए दीर्घावधिक कोष जुटाना था क्योंकि बैंक छोटे और कमजोर थे।
- इसलिए सरकार ने वित्तीय संस्थान गठित करने का निर्णय लिया जो कि बैंकों की भूमिका निभा सके।
- इन वित्तीय संस्थानों द्वारा औद्योगिक वित्त पोषण को भारत में 'परियोजना वित्त पोषण' (Project Financing) कहा गया। इस परियोजना के तहत स्थापित वित्तीय संस्थानों में "विकास बैंक" प्रमुख है जिन्हें आगे पढ़ेंगे।।
मुद्रा बाजार की भांति ही पूंजी बाजार में भी लेनदेन कई साधनों/ उपकरणों के माध्यम से होती है जिन्हें पढ़ना जरूरी है