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पूंजी बाजार उपकरण व साधन


किसी अर्थव्यवस्था में होने वाले धन के लेन देन के बाजार को उसका वित्तीय बाजार कहते हैं। इसके दो रूप है अल्पावधिक वित्तीय बाजार (मुद्रा बाजार) तथा दीर्घावधिक वित्तीय बाजार (पूंजी बाजार)।

पढ़ें : वित्त बाजार एवं इसके प्रकार ↗

दीर्घावधिक (कम से कम 365 दिन और अधिक की) लेन देन वाला वित्तीय बाजार को पूंजी बाजार कहा जाता है।

पूंजी बाजार में ये दीर्घावधिक लेनदेन जिन उपकरणों या साधनों के माध्यम से होती है वे साधन निम्नलिखित है:-

शेयर या स्टॉक (Share or Stock)

कंपनी द्वारा जारी प्रतिभूति (Security) जो स्वामित्व के एक हिस्से का प्रतिनिधित्व करती है, इनका खरीददार कंपनी की संपत्ति व आय में हिस्सेदार होता है अर्थात इन्हें ब्याज नहीं लाभांश प्राप्त होता है।

  1. इक्विटी शेयर या साधारण शेयर (Equity Shares or Common Shares)
    • मतदान अधिकार मिलता है, कंपनी का वास्तविक मालिक, पर लाभ(आय) या घाटे दोनों में हिस्सेदारी।
  2. वरीयता या अधिमान शेयर (Preference Shares):

    मतदान अधिकार नहीं, पर केवल आय/लाभ में हिस्सेदारी, ऋण पर ब्याज की तरह लाभांश निश्चित, कंपनी डूबने पर पुनर्भुगतान इक्विटी से पहले।

    1. संचयी वरीयता या अधिमान शेयर (Cumulative Preference Shares)

      जिनका लाभांश, यदि कंपनी द्वारा किसी विशेष वर्ष में घाटे या किसी अन्य कारण से भुगतान नहीं किया जाता है, तो जमा हो जाता है और अगले वर्ष या उसके बाद भुगतान कर दिया जाता है।

    2. गैर-संचयी वरीयता या अधिमान शेयर (Non-Cumulative Preference Shares):

      यदि कंपनी द्वारा किसी विशेष वर्ष में घाटे या किसी अन्य कारण से भुगतान नहीं किया जाता है, तो जमा नहीं होता है और उसे छोड़ दिया जाता है।

ऋण उपकरण (Debt Instruments)

शेयर(shares/ equity) तथा ऋण(Debt) उपकरणों में अंतर

1. बॉन्ड (Bonds):

2. डिबेंचर (Debentures)

डिबेंचर व बॉन्ड में अंतर

3. डेरिवेटिव या व्युत्पन्न (Derivatives)

खरीदार विक्रेता से एक पूर्व-निर्धारित तिथि को एक निर्धारित मूल्य पर अंतर्निहित परिसंपत्तियों (शेयरों, बॉन्ड, कमोडिटी, आदि) को खरीदने के लिए सहमत होता है। भविष्य में कीमत में होने वाले जोखिम और अनिश्चितताओं को कम करते हैं। कंपनी द्वारा जोखिम- बचाव उपकरणों (Risk-hedging Instruments) के रूप में उपयोग। पूर्व-समझौता मूल्य को स्ट्राइक मूल्य (Strike Price) कहा जाता है।

डेरिवेटिव के प्रकार:

  1. फॉरवर्ड अनुबंध (Forward Contracts)
    • कारोबार आम तौर पर ओवर-द-काउंटर (OTC) होता है, अर्थात प्रत्यक्ष रूप से दो शामिल पक्षों के बीच बातचीत की जाती है, न कि किसी केंद्रीयकृत एक्सचेंज पर। अर्थात ये अनियमित (Unregulated) होते हैं।
    • केवल एक बार निपटान किया जाता हैं – अनुबंध की अंतिम तिथि पर।
    • उदाहरण: रमेश और सुरेश आपस में एक अनुबंध करते हैं कि रमेश 3 महीने बाद 100 ग्राम सोना ₹55,000 प्रति 10 ग्राम की दर से खरीदेगा। यदि उस समय सोने की कीमत ₹60,000 हो गई, फिर भी उसे ₹55,000 में देना होगा, या कीमत 50,000 हो गई तो रमेश को 55,000 में लेना होगा।
  2. वायदा या फ्यूचर अनुबंध (Future Contracts or Futures)
    • फॉरवर्ड अनुबंधों के विपरीत, फ्यूचर अनुबंधों का कारोबार संगठित एक्सचेंजों पर किया जाता है। इस प्रकार, ये विनियमित (Regulated) होते हैं।
    • अंतर्निहित परिसंपत्ति की कीमत में परिवर्तन का निपटान दैनिक आधार पर किया जाता है, अर्थात एक्सचेंज पर ट्रेड किया जा सकता है। तरलता अधिक।
  3. ऑप्शन या विकल्प (Options)
    • आज के सहमत मूल्य पर अंतर्निहित परिसंपति को खरीदने या बेचने का अधिकार देता है, लेकिन बाध्यता नहीं।
    • ऑप्शन धारक द्वारा अनुबंध को पूरा करने का अधिकार प्राप्त करने (लेकिन दायित्व नहीं) के लिए ऑप्शन राइटर को एक प्रीमियम मूल्य का भुगतान किया जाता है।
    • कारोबार संगठित एक्सचेंजों (Organized Exchanges) के माध्यम से किया जाता है। इस प्रकार, ये विनियमित (Regulated) होते हैं।

    ऑप्शन प्रकार:

    1. कॉल ऑप्शन (Call Option)

      अंतिम तिथि से पूर्व, पूर्व-निर्धारित तिथि पर एक पूर्व-निर्धारित मूल्य पर अंतर्निहित संपत्ति (Underlying Asset) को “खरीदने (Buy)” का अधिकार देता है।

    2. पुट ऑप्शन (Put Option)

      अंतिम तिथि से पहले, ऑप्शन धारक को एक पूर्व-निर्धारित तिथि पर एक पूर्व-निर्धारित मूल्य पर अंतर्निहित संपत्ति (Underlying Asset) को “बेचने (Sell)” का अधिकार देता है।

  4. स्वैप या अदला-बदली (Swaps)
    • स्वैप एक वित्तीय अनुबंध होता है, जिसमें दो पक्ष आपस में भविष्य के नकदी प्रवाह (cash flows) को एक तय फॉर्मूले के अनुसार अदल-बदल (exchange) करते हैं।
    • स्वैप का प्रयोग आम तौर पर ब्याज दरों और मुद्राओं के बाजार मूल्य में उतार-चढ़ाव से संबंधित जोखिमों को प्रबंधित करने के लिए किया जाता है।
    • स्वैप प्रकार :
      1. ब्याज दर स्वैप (Interest Rate Swap)
        • इसमें कंपनियां अपने ब्याज दर टाइप को आपस में बदलती है। ऐसे समझो कि दो कंपनियों ने लोन लिए हैं:
        • कंपनी A ने बैंक से 10 करोड़ रुपये 10% फिक्स्ड रेट पर लोन लिया है।
        • कंपनी B ने बैंक से 10 करोड़ रुपये 8% फ्लोटिंग रेट (जो हर 6 महीने में बदलती है) पर लोन लिया है।
        • अब: कंपनी A को डर है कि बाजार दर कम हो जाएगी, तो वह फ्लोटिंग रेट से फायदा नहीं उठा पाएगी।
        • कंपनी B को डर है कि दर बढ़ जाए, तो ब्याज ज्यादा देना पड़ेगा।
        • तो दोनों कंपनियां आपस में ब्याज दरें एक्सचेंज कर लेती हैं।
      2. मुद्रा स्वैप (Currency Swaps):

        जहां दो पक्ष विभिन्न मुद्राओं में नकदी प्रवाह का आदान-प्रदान करते हैं।

        • दो कंपनियां जिनकी मुद्रा अलग होती है, वे एक-दूसरे से लोन लेकर एक-दूसरे की मुद्रा में भुगतान करती हैं।
        • भारतीय कंपनी A को अमेरिका में काम करना है, उसे डॉलर चाहिए।
        • अमेरिकी कंपनी B को भारत में काम करना है, उसे रुपये चाहिए।
        • दोनों कंपनियां एक-दूसरे को लोन देती हैं और तय समय तक मूलधन व ब्याज भुगतान एक-दूसरे की मुद्रा में करती हैं।

4. मुद्रा डेरिवेटिव्स ( Currency Derivatives)

मुद्रा डेरिवेटिव्स वे वित्तीय अनुबंध होते हैं जिनका मूल्य एक या एक से अधिक विदेशी मुद्राओं (Foreign Currencies) की विनिमय दर (Exchange Rate) पर आधारित होता है। इनका उपयोग मुख्यतः मुद्रा विनिमय दरों के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा (Hedging) या मुनाफा कमाने (Speculation) के लिए किया जाता है।

इसमें यह शामिल होता है कि दो मुद्राओं का भविष्य की तिथि पर एक निर्धारित विनिमय दर पर आदान-प्रदान किया जा सकता है, भले ही विनिमय के दिन प्रचलित विनिमय दर कुछ भी हो।

5. म्यूचुअल फंड (Mutual Funds)

6. एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF)

7. विदेशी निवेश के उपकरण (Instruments of Foreign Investments)

  1. डिपॉजिटरी रसीदें (Depository Receipts – DRs)
    • किसी फर्म की प्रतिभूतियों को फर्म के घरेलू क्षेत्राधिकार में एक घरेलू संरक्षक (Domestic Custodian) के पास जमा किया जाता है, और विदेश में एक समान “जमापूँजी रसीद” जारी की जाती है, जिसे विदेशी निवेशक खरीद सकते हैं।
    • अमेरिकी डिपॉजिटरी रसीदें (American Depository Receipts – ADRs)
      • उदाहरण के लिए, यदि कोई भारतीय कंपनी अमेरिकी बाजार से धन एकत्रित करना चाहती है, तो वह अपने शेयर किसी अमेरिकी बैंक को दे देती है। उन शेयरों के बदले में, अमेरिकी बैंक भारतीय कंपनी को रसीदें प्रदान करता है। फिर कंपनी अमेरिकी शेयर बाजार में उन ADR रसीदों को प्रदान करके धन जुटाती है।
    • वैश्विक डिपॉजिटरी रसीदें (Global Depository Receipts – GDRs)
      • ये ADR के समान हैं, लेकिन संयुक्त राज्य के बाहर जमा बैंक द्वारा जारी किए जाते हैं।
      • इन्हें विश्वभर के स्टॉक एक्सचेंजों पर विभिन्न मुद्राओं में कारोबार किया जा सकता है, जो जमा बैंक के स्थान के आधार पर निर्भर करता है।
      • इन्हें विदेशी कंपनी की घरेलू मुद्रा, अमरीकी डॉलर (USD), या डिपॉजिटरी बैंक के स्थान की मुद्रा में दर्शाया जा सकता है।
  2. विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड (Foreign Currency Convertible Bond – FCCB)
    • विशेष प्रकार का परिवर्तनीय बॉन्ड होता है, जो जारीकर्ता की घरेलू मुद्रा से अलग किसी विदेशी मुद्रा में जारी किया जाता है। परिवर्तनय अर्थात शेयर में बदलने की सुविधा।
  3. पार्टिसिपेटरी नोट्स (Participatory Notes – P-Notes)
    • विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) या डीलर, जो SEBI के साथ पंजीकृत हैं, विदेशी स्टॉक बाजार में निवेश करने के इच्छुक ऐसे विदेशी निवेशकों को P-Notes जारी करते हैं जो SEBI के साथ रजिस्टर्ड नहीं है।
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