मुद्रा आपूर्ति (Money Supply)
'मुद्रा आपूर्ति' से आशय मुद्रा की कुल मात्रा से है, जो अर्थव्यवस्था में लोगों द्वारा विभिन्न रूपों में अपने पास रखी जाती है। इसे मुद्रा स्टॉक (Money stock) भी कहा जाता है।
आम बातचीत में धन की आपूर्ति का अर्थ होता है - धन का प्रसार (मनी सर्कुलेशन) यानी अर्थव्यवस्था में धन का बहाव।
लेकिन बैंकिंग और ठेठ मौद्रिक प्रबंधन शब्दावली में M3 लेवल और M3 आपूर्ति को धन की आपूर्ति कहा जाता है।
इस टॉपिक को सिंपल तरीके से समझो:
- इस टॉपिक में डरना नहीं है ये टॉपिक सबसे पहले अर्थव्यवस्था में उपस्थित सम्पूर्ण धन को आरक्षित धन(M0) का नामकरण दे रहा है (चाहे धन बैंक में हो या RBI के पास हो या लोगों के पास सब M0 है)
- M0 बस एक संकेतक है आरक्षित धन का और कुछ नहीं।
- आगे चलकर इस टॉपिक में इस M0 को अलग अलग वर्ग में वर्गीकृत किया गया है ताकि सरकारी नीतियां आसान हो।
- तो अगर मुद्रा आपूर्ति में आपको m1, m2, m3, m4 करके संकेतक दिखे तो डरना नहीं है, यहां बस आरक्षित धन की अलग अलग केटेगरी बनाई गई है।
1. आरक्षित मुद्रा (Reserve Money) या M0 :
- यह अर्थव्यवस्था में उपस्थित मूल धन है, मुद्रा की मूल मात्रा या आपूर्ति है जिसे बाद में मौद्रिक सहूलियत के लिए तरलता के आधार पर M1, M2, M3, M4 में वर्गीकृत किया गया।
- इसे उच्चस्तरीय मुद्रा (High powered Money), मूल धन (Basic Money) या प्राथमिक मुद्रा (Primary Money) भी कहा जाता है।
- यह अन्य सभी प्रकार की मुद्रा का स्रोत है।
1.1 RBI की शब्दावली में आरक्षित धन :
नीचे दिए गए 6 सेग्मेंट के सकल पूंजी को सरकार या अर्थव्यस्था के लिए आरक्षित धन (रिजर्व मनी-आरएम) के तौर पर जाना जाता है:
- आरबीआई की ओर से सरकार को दिया गया कुल कर्ज;
- आरबीआई की ओर से बैंकों को दिया गया कुल उधार;
- आरबीआई की ओर से वाणिज्यिक बैंकों को दिया गया कुल उधार;
- आरबीआई के पास मौजूद कुल विदेशी मुद्रा;
- सरकार की जनता के लिए मुद्रा की जवाबदेही;
- आरबीआई की कुल गैर-मौद्रिक जवाबदेही;
Reserve Money = 1+2+3+4+5+6.
मुद्रा तरलता (Liquidity of Money)
तरलता का अर्थ है कि आप कितनी जल्दी अपनी नकदी प्राप्त कर सकते हैं।
जब हम M1 से M4 की और जाएंगे तो धन की तरलता (जड़ता, स्थिरता, खर्च करने की क्षमता) घटेगी और विपरीत दिशा में तरलता बढ़ेगी।
2. तरलता के आधार पर मुद्रा आपूर्ति का वर्गीकरण :
मुद्रा की पूर्ति पर विचार करने के लिए RBI ने सर्वप्रथम 1961 में एक कार्यकारी समिति का गठन किया। इसके पश्चात दूसरा कार्यकारी समूह 1977 में गठित किया जिसने तरलता के माप के आधार पर मुद्रा को चार वर्गों में बांटा गया:
- M₁ = जनता के पास मुद्रा (करेन्सी नोट तथा सिक्के) + बैंकों की माँग जमाएँ (चालू और बचत खातों पर) + रिजर्व बैंक के पास अन्य जमाएँ ।
- M₂ = m₁ + डाकघरों की बचत बैंक जमाएँ।
- M₃ = m₁ + बैंकों तथा सहकारी बैंकों की समय जमाएँ, या
- M₃ = जनता के पास चलन + बैंकों की चालू एवं बचत जमाएँ + बैंकों की सावधि जमाएँ + रिजर्व बैंक के पास अन्य जमाएँ।
- M4 = m₃ + डाकघर की कुल जमाराशि।


इन्हें समझें :
- M1 सबसे तरल तथा M4 सबसे कम तरल है।
- तरलता की दृष्टि से इन चारों का क्रम है- M₁>M2>M3>M4
- M0 (मौद्रिक आधार), M1 (संकुचित मुद्रा), M2और M3(व्यापक मुद्रा)।
2.1 संकीर्ण मुद्रा (Narrow Money)
- बैंकों की शब्दावली में, M1 को संकीर्ण धन कहा जाता है क्योंकि यह अत्यधिक तरल होता है और बैंक इस धन के सहारे कर्ज बांटने का काम कर सकते हैं।
2.2 विस्तृत मुद्रा (Broad Money) :
- बैंक की शब्दावली में M3 में शामिल धन को विस्तृत धन (ब्रॉड मनी) कहा जाता है।
- इस धन के साथ (यह धन बैंक के पास ज्ञात समय के लिए होता है) बैंक कर्ज बांटने का अपना प्रोग्राम चलाते हैं।
2.3 उच्च शक्ति वाला धन (High Power Money) :
- केंद्रीय बैंक द्वारा जारी मुद्रा को उच्च शक्ति वाला धन कहा जाता है क्योंकि आमतौर पर इसके पीछे 'आरक्षित निधि' का संबल होता है, और जिसकी गारंटी सरकार देती है और ये धन के दूसरे सभी प्रकारों का स्रोत होता है।
- केंद्रीय बैंक/ सरकार द्वारा जारी की जाने वाली मुद्रा दरअसल केंद्रीय बैंक और सरकार की देयता होती है और उसके एवज में उसी मूल्य की संपत्तियां रखी जानी अनिवार्य हैं, जो मुख्यत प्रतिशत सोना और विदेशी मुद्रा भंडार होती हैं। व्यवहार में ज्यादातर देशों ने 'न्यूनतम आरक्षित निधि प्रणाली' को अपना लिया है।
2.3.1 न्यूनतम आरक्षित निधि प्रणाली :
- न्यूनतम आरक्षित निधि प्रणाली के तहत केंद्रीय बैंक को एक न्यूनतम मात्रा में सोना और विदेशी प्रतिभूतियां रखनी होती है फिर कितनी भी मात्रा में मुद्रा जारी करने का अधिकार।
न्यूनतम भंडार (Minimum Reserve) :
आरबीआई के लिए ₹200 करोड़ के बराबर का सोना और विदेशी मुद्रा अपने पास रखना जरूरी है। इनमें से र 115 करोड़ का सोना होना चाहिए। इस संचय के एवज में आरबीआई को कितनी भी मुद्रा छापने की छूट मिली हुई है। इसका पालन 1957 से हो रहा है और इसे न्यूनतम संचय प्रणाली (एमआरएस) के तौर पर जाना जाता है। (वर्तमान में केवल 115 करोड़ का सोना रखना होता है)
2.3.2 भारत में उच्च शक्ति मुद्रा आपूर्ति के दो स्रोत है:
- RBI
- आरबीआई 2, 5, 10, 20, 50, 100, 500 और 2000 रुपये के नोट जारी करता है जिसे आरबीआई 'आरक्षित धन' कहता है।
- भारत सरकार
- आरबीआई भारत सरकार की तरफ से एक रुपये का नोट और सिक्के जिनमें कम मूल्य के सिक्के भी शामिल हैं, जारी करता है जो कुल उच्च शक्ति वाले धन का करीब 2 प्रतिशत है।
अर्थव्यवस्था में मुद्रा का प्रवाह कहाँ-कहाँ व्याप्त है, इस बात की जानकारी रिजर्व बैंक द्वारा रखी जाती है, ताकि मौद्रिक नीतियों का संचालन किया जा सके एवं अर्थव्यवस्था में मुद्रा के प्रवाह के स्तर का मूल्यांकन किया जा सके। 1977 में पूंजी की आपूर्ति पर गठित दूसरे कार्य समूह की अनुशंसाओं के आधार पर आरक्षित मुद्रा (M0) के अलावा M1 M2, M3, और M4 के आंकड़ों को भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रकाशित किया जाता रहा है।